अंबिकापुर । जेल की ऊंची दीवारों के बीच जहां बंदी अपनी सजा पूरी कर रहे हैं, वहीं शिक्षा उनके जीवन में बदलाव की नई उम्मीद जगा रही है। केंद्रीय जेल अंबिकापुर में संचालित संस्कृत विद्यालय की पहल अब सकारात्मक परिणाम देने लगी है। यहां बंदियों को नवसाक्षर से साक्षर बनाने के साथ उन्हें आगे की औपचारिक शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
इसी पहल के तहत हाल ही में कक्षा आठवीं की परीक्षा में केंद्रीय जेल के चार बंदी शामिल हुए। इनमें एक महिला और तीन पुरुष बंदी थे। परीक्षा परिणाम सामने आया तो चारों ने प्रथम श्रेणी से सफलता हासिल कर जेल प्रशासन की शिक्षा मुहिम को नई मजबूती दी।
सफल होने वाले बंदियों में महेंद्र राजवाड़े, चंद्रभान सिंह, राजू राम और महिला बंदी बिट्टन शामिल हैं। जेल प्रशासन के अनुसार, इन बंदियों ने पहले नवसाक्षर से साक्षर बनने की प्रक्रिया पूरी की और इसके बाद नियमित रूप से आठवीं कक्षा की पढ़ाई कर परीक्षा दी।
जेल की चारदीवारी में किताबों से भविष्य संवारने की कोशिश
जेल प्रशासन का कहना है कि कारावास का उद्देश्य केवल सजा पूरी कराना नहीं, बल्कि बंदियों को समाज की मुख्यधारा में दोबारा शामिल होने के लिए तैयार करना भी है। इसी सोच के तहत बंदियों को शिक्षा, संस्कार और सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ा जा रहा है।
आठवीं कक्षा में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण चारों बंदियों की सफलता को इसी दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। अब इन सफल बंदियों से विद्यालय के संचालन में भी सहयोग लेने की तैयारी है, ताकि वे स्वयं आगे पढ़ने के साथ दूसरे बंदियों को भी शिक्षा के लिए प्रेरित कर सकें।
8वीं, 10वीं और 12वीं की पढ़ाई का रास्ता खोलने की तैयारी
केंद्रीय जेल अंबिकापुर में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत हो चुकी है। जेल प्रशासन का लक्ष्य अधिक से अधिक बंदियों को शिक्षा से जोड़ना है। इसके लिए कक्षा आठवीं, दसवीं और बारहवीं की पढ़ाई शुरू कराने के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ राज्य ओपन स्कूल से पत्राचार किया गया है।
अनुमति मिलने के बाद बड़ी संख्या में बंदियों को औपचारिक शिक्षा से जोड़ने की योजना है। इससे उन बंदियों को भी पढ़ाई का अवसर मिलेगा, जो किसी कारणवश अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर सके।
शिक्षा बनेगी समाज में वापसी का आधार
केंद्रीय जेल अंबिकापुर की यह पहल सिर्फ परीक्षा पास कराने तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य बंदियों में आत्मविश्वास पैदा करना, उन्हें सकारात्मक दिशा देना और जेल से बाहर निकलने के बाद सम्मानजनक जीवन के लिए तैयार करना है।
जेल की चारदीवारी भले ही बंदियों को समाज से दूर रखती हो, लेकिन किताब और कलम उनके लिए भविष्य के दरवाजे खोल सकती है। केंद्रीय जेल अंबिकापुर में शिक्षा के जरिए बदलाव की यह कोशिश इसी सोच को जमीन पर उतारती नजर आ रही है।










