करोड़ों की सड़क… और चंद महीनों में दरारें! PM जनमन की सड़क पर उठे गुणवत्ता के सवाल, भरतपुर में ग्रामीणों का फूटा गुस्सा

भरतपुर। जिस सड़क से आदिवासी बहुल इलाके में विकास की रफ्तार बढ़ाने का दावा किया गया था, वही सड़क अब निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर रही है। करीब 2.33 करोड़ रुपये की लागत से बनी चिडौला-कर्री-बैगापारा सड़क चंद महीनों में ही जगह-जगह दरकने लगी है। कहीं सड़क में लंबी दरारें हैं, कहीं गड्ढे उभर आए हैं तो कई हिस्सों में सड़क धंसने के साथ किनारे भी कटने लगे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि सड़क निर्माण के दौरान गुणवत्ता पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। यही वजह है कि सड़क पूरी तरह पुरानी होने से पहले ही उसकी हालत खराब होने लगी है। सवाल अब सड़क की उम्र का नहीं, बल्कि निर्माण की गुणवत्ता और निगरानी का है।

4.30 किलोमीटर सड़क, खर्च हुए 2.33 करोड़

चिडौला से कर्री-बैगापारा को जोड़ने वाली इस सड़क की लंबाई करीब 4.30 किलोमीटर बताई जा रही है। इसका निर्माण प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान यानी पीएम जनमन योजना के तहत कराया गया है। सड़क किनारे लगे शिलापट्ट के अनुसार निर्माण कार्य 27 फरवरी 2025 को शुरू हुआ था और 13 मार्च 2026 को पूरा किया गया। निर्माण पर 233.04 लाख रुपये, यानी करीब 2.33 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। लेकिन निर्माण पूरा होने के कुछ ही समय बाद सड़क की तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है। डामर की परत कई जगह से उखड़ रही है और सड़क की सतह पर दरारें साफ नजर आ रही हैं।

सड़क धंसी तो बढ़ेगा खतरा

ग्रामीणों के मुताबिक सड़क के कई हिस्सों में जमीन बैठने लगी है। सड़क के किनारे कटाव भी दिखाई दे रहा है। बरसात के मौसम में पानी का बहाव बढ़ने पर इन हिस्सों के और ज्यादा क्षतिग्रस्त होने की आशंका है। सबसे चिंता की बात यह है कि सड़क पर बनी पुलिया के एप्रोच हिस्से में भी दरार और उखड़ने के निशान सामने आए हैं। यदि सड़क का यह हिस्सा और बैठता है तो दोपहिया और चारपहिया वाहनों के लिए परेशानी के साथ दुर्घटना का खतरा भी बढ़ सकता है।

योजना का मकसद कनेक्टिविटी बढ़ाना, लेकिन सड़क ही बनी परेशानी

पीएम जनमन योजना का उद्देश्य आदिवासी बहुल और विशेष रूप से कमजोर जनजातीय आबादी वाले क्षेत्रों तक बुनियादी सुविधाओं की पहुंच मजबूत करना है। सड़क भी इसी उद्देश्य से बनाई गई थी, ताकि ग्रामीणों को बेहतर आवागमन की सुविधा मिल सके। लेकिन सड़क की शुरुआती हालत देखकर ग्रामीणों के मन में अब सवाल उठने लगे हैं कि अगर करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई गई सड़क कुछ ही महीनों में टूटने लगे, तो इसका फायदा आखिर कब तक मिलेगा?

2031 तक ठेकेदार की जिम्मेदारी, फिर इतनी जल्दी क्यों बिगड़ी सड़क?

शिलापट्ट के अनुसार सड़क के रखरखाव की जिम्मेदारी 12 मार्च 2031 तक संबंधित ठेकेदार की है। इसके लिए करीब 15.95 लाख रुपये का प्रावधान भी किया गया है।

यही जानकारी अब पूरे मामले को और गंभीर बना रही है।

जब सड़क के रखरखाव की जिम्मेदारी अभी करीब पांच साल तक तय है, तो निर्माण के कुछ ही महीनों बाद सड़क पर आई दरारों और धंसाव की जिम्मेदारी कौन लेगा?

क्या सड़क निर्माण की गुणवत्ता की तकनीकी जांच होगी?
क्या निर्माण में इस्तेमाल सामग्री की जांच होगी?
क्या जिम्मेदार एजेंसी से जवाब मांगा जाएगा?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या सड़क को सिर्फ ऊपर से पैबंद लगाकर छोड़ दिया जाएगा या इसकी वास्तविक गुणवत्ता की जांच होगी?

ग्रामीणों की मांग—जांच हो और जिम्मेदारी तय हो

ग्रामीणों का कहना है कि यह सड़क उनके लिए महज आवागमन का रास्ता नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ा महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग है। सड़क खराब होने से आने-जाने में परेशानी के साथ बारिश के दिनों में खतरा और बढ़ सकता है।

ग्रामीणों ने सड़क की गुणवत्ता की निष्पक्ष तकनीकी जांच कराने, क्षतिग्रस्त हिस्सों की तत्काल मरम्मत कराने और लापरवाही पाए जाने पर जिम्मेदारी तय करने की मांग की है।

अब नजर संबंधित विभाग और निर्माण एजेंसी की कार्रवाई पर है। करोड़ों की लागत से बनी सड़क अगर चंद महीनों में ही जवाब देने लगे, तो सवाल उठना लाजिमी है—आखिर विकास की इस सड़क में गुणवत्ता कहां रह गई?

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