राष्ट्रपति भवन में गूंजेगी छत्तीसगढ़ की लोकधुन, गेंड़ी और गौर मड़िया नृत्य बनेगा आकर्षण

नई दिल्ली। 12 अगस्त 2026। स्वतंत्रता दिवस की 80वीं वर्षगांठ पर इस बार राष्ट्रपति भवन का ‘एट होम’ समारोह छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक एवं जनजातीय सांस्कृतिक विरासत का साक्षी बनेगा। 15 अगस्त को आयोजित होने वाले विशेष समारोह में छत्तीसगढ़ के गेंड़ी और गौर मड़िया नृत्य देश के सामने राज्य की अनूठी सांस्कृतिक पहचान को प्रस्तुत करेंगे। राष्ट्रपति भवन में छत्तीसगढ़ के साथ गोवा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की लोक एवं पारंपरिक कला परंपराओं का भी भव्य प्रदर्शन होगा। चारों राज्यों के करीब 35 कलाकार लोकनृत्य और पारंपरिक संगीत की प्रस्तुतियां देंगे।

गेंड़ी और गौर मड़िया नृत्य होंगे खास आकर्षण

छत्तीसगढ़ की प्रस्तुति में हरेली पर्व से जुड़ा गेंड़ी नृत्य खास आकर्षण रहेगा। ऊंची बांस की गेंड़ियों पर कलाकारों का संतुलन, फुर्ती और कौशल इस पारंपरिक नृत्य को विशिष्ट बनाता है। वहीं बस्तर के मड़िया समुदाय का गौर मड़िया नृत्य जनजातीय जीवन, वीरता और प्रकृति के साथ समुदाय के गहरे रिश्ते को अभिव्यक्त करेगा। पारंपरिक वेशभूषा और आकर्षक शिरोभूषण इस प्रस्तुति को और खास बनाएंगे।समारोह में लावणी, तुतारी, सोंगी मुखावटे, गेंड़ी, गौर मड़िया, भगोरिया, बैगा करमा, सामई और घोड़े मोडनी जैसी पारंपरिक प्रस्तुतियां भी शामिल होंगी।

बस्तर की मंगल धुन से होगी सांगीतिक प्रस्तुति की शुरुआत

राष्ट्रपति भवन में होने वाली संगीत प्रस्तुति की शुरुआत छत्तीसगढ़ और बस्तर की पारंपरिक अनुष्ठानिक मंगल धुन से होगी। इसके बाद महाराष्ट्र, गोवा और मध्य प्रदेश की लोक संगीत परंपराओं को मंच मिलेगा। कार्यक्रम के अंतिम चरण में चारों राज्यों के कलाकार संयुक्त प्रस्तुति देकर सांस्कृतिक एकता का संदेश देंगे। इस सांगीतिक प्रस्तुति का संयोजन छत्तीसगढ़ के लोक गायक, संगीतकार, लेखक एवं रंगकर्मी राकेश कुमार तिवारी ने किया है। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित तिवारी छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के संरक्षण और संवर्धन के लिए जाने जाते हैं।

बालोद और नारायणपुर के कलाकार दिखाएंगे बस्तर की संगीत विरासत

इस प्रस्तुति में बालोद और नारायणपुर के कलाकार भी शामिल होंगे। बालोद के कलाकार मोहरी, दफड़ा, दमाऊ, गुड़ुम और बांसुरी जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन बिखेरेंगे। वहीं नारायणपुर के कलाकार गुटा परई, नार परई, ढोल और कुंदिर जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों के माध्यम से बस्तर की लोक संगीत परंपरा को राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करेंगे।

ढोकरा से पनिका बुनाई तक दिखेगी छत्तीसगढ़ की पहचान

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक झलक केवल नृत्य और संगीत तक सीमित नहीं रहेगी। राष्ट्रपति भवन में ढोकरा कला और बस्तर के पारंपरिक लौह शिल्प के जरिए राज्य की समृद्ध हस्तशिल्प परंपरा को भी प्रदर्शित किया जाएगा। वहीं चारों राज्यों की विशिष्ट वस्त्र परंपराओं को भी साझा प्रस्तुति में शामिल किया गया है। इसमें छत्तीसगढ़ की पनिका बुनाई, महाराष्ट्र की करवत काठी साड़ी, गोवा की कुंभी साड़ी और मध्य प्रदेश की महेश्वरी बुनाई को स्थान मिलेगा।

संस्कृति के साथ प्रकृति संरक्षण का संदेश

इस वर्ष की सांस्कृतिक प्रस्तुति केवल भारत की विविधता दिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि संस्कृति और प्रकृति के गहरे संबंध को भी सामने रखेगी। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में बस्तर की पारंपरिक जीवनशैली, स्थानीय शिल्प और पवित्र उपवनों के संरक्षण की परंपराएं यह संदेश देंगी कि जनजातीय संस्कृति में प्रकृति केवल जीवन का आधार नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा है।

राष्ट्रपति भवन में होने वाला यह आयोजन छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का अवसर होगा, जहां बस्तर की लोकधुन, जनजातीय नृत्य, पारंपरिक वाद्ययंत्र, शिल्प और पनिका बुनाई राष्ट्रीय मंच पर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान और विरासत की मजबूत तस्वीर पेश करेंगे।

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