कभी जहां गूंजती थी बच्चों की आवाजें, आज वहां बिखरी हैं ईंटें और टूटे सपनों की तस्वीरें

चिरमिरी। कभी सुबह की घंटी के साथ जहां बच्चों की आवाजें गूंजती थीं… जहां कक्षाओं में भविष्य के सपने आकार लेते थे… जहां शिक्षक सिर्फ किताबों का ज्ञान नहीं, बल्कि जिंदगी जीने की सीख देते थे—आज उसी जगह खामोशी पसरी है।
लाहिड़ी बहुउद्देशीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की पुरानी ऐतिहासिक इमारत अब मलबे में बदल चुकी है।
17 अगस्त 2026 का दिन चिरमिरी के उन हजारों लोगों के लिए भावुक कर देने वाला रहा, जिनका बचपन इस विद्यालय की दीवारों के बीच बीता। इमारत का बड़ा हिस्सा ढह गया, लेकिन उसके साथ जुड़ी यादें आज भी लोगों के दिलों में जस की तस हैं।
1948 से खड़ी थी शिक्षा की यह पहचान
स्कूल के प्रवेश द्वार पर लगा बोर्ड इसकी स्थापना वर्ष 1948 बताता है। यानी यह परिसर चिरमिरी की शैक्षणिक यात्रा के एक लंबे दौर का गवाह रहा है।
दशकों तक यहां विद्यार्थियों की पीढ़ियां पढ़ती रहीं। किसी ने यहीं पहली बार स्कूल की पोशाक पहनी, किसी ने इसी परिसर में अपने जीवन का पहला पुरस्कार जीता, तो किसी ने इसी स्कूल से निकलकर उच्च शिक्षा और रोजगार की नई राह पकड़ी। आज वही इमारत टूटे हुए दरवाजों, खाली खिड़कियों, ढही छत और बिखरी ईंटों के रूप में दिखाई दे रही है।
दीवारें टूटीं, लेकिन यादें नहीं
पुरानी इमारत की तस्वीरें सामने आते ही पूर्व विद्यार्थियों की यादें भी ताजा हो रही हैं। किसी को प्रार्थना सभा याद है, किसी को शिक्षक की डांट। किसी को दोस्तों के साथ मैदान में बिताया समय याद है, तो किसी को परीक्षा के दिनों की भागदौड़।
स्कूल के पुराने विद्यार्थियों के लिए यह भवन केवल चार दीवारें नहीं था। यह उनके बचपन का पता था।
यही कारण है कि इमारत के ढहने का दर्द केवल एक पुराने भवन के खत्म होने का दर्द नहीं है। यह उन लोगों के लिए अपने जीवन के एक खूबसूरत हिस्से को आंखों के सामने खत्म होते देखने जैसा है।
तस्वीरें बता रही हैं इमारत की कहानी
मौके से सामने आई तस्वीरों में भवन की जर्जर स्थिति साफ दिखाई देती है। पुरानी दीवारों पर समय के निशान हैं। कई हिस्सों की छत और दीवारें टूट चुकी हैं। खिड़कियों के खाली फ्रेम, उखड़ी हुई प्लास्टर की परतें, काई और दीवारों पर उगी वनस्पतियां इस इमारत की लंबी यात्रा को बयां करती हैं।
एक समय जिस भवन में शिक्षा का उजाला था, आज वहां मलबे का ढेर दिखाई दे रहा है। और यही दृश्य एक सवाल छोड़ जाता है—
क्या किसी शहर की ऐतिहासिक शैक्षणिक विरासत को सिर्फ पुरानी और जर्जर इमारत मानकर खत्म कर देना पर्याप्त है?
लाहिड़ी स्कूल सिर्फ स्कूल नहीं था
चिरमिरी की पहचान केवल कोयला खदानों और औद्योगिक इतिहास से नहीं बनी। शहर की सामाजिक और शैक्षणिक पहचान बनाने में ऐसे संस्थानों की भी बड़ी भूमिका रही है।
लाहिड़ी स्कूल ने लंबे समय तक आसपास के बच्चों को शिक्षा का अवसर दिया। यहां पढ़ने वाले विद्यार्थी आगे बढ़े और अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई। इसीलिए इस भवन की कहानी केवल एक स्कूल भवन की कहानी नहीं है।
यह चिरमिरी की उस पीढ़ी की कहानी है जिसने इसी परिसर से अपने भविष्य की पहली सीढ़ी चढ़ी थी।
अब इतिहास को बचाने की जिम्मेदारी किसकी ?
ऐतिहासिक इमारत के ढह जाने के बाद अब एक और महत्वपूर्ण सवाल सामने है—क्या स्कूल से जुड़े पुराने दस्तावेज और स्मृतियां सुरक्षित हैं?
विद्यालय के पुराने प्रवेश रजिस्टर, परीक्षा रिकॉर्ड, प्राचार्यों और शिक्षकों की सूची, पुरानी तस्वीरें, प्रमाणपत्र और पूर्व विद्यार्थियों की यादें आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सामग्री हो सकती हैं।
अगर भवन नहीं बच सका, तो कम से कम उसका इतिहास तो सुरक्षित रहना चाहिए।
प्रशासन, विद्यालय प्रबंधन और पूर्व विद्यार्थियों के सहयोग से पुराने दस्तावेजों और तस्वीरों का डिजिटल संग्रह तैयार किया जा सकता है। स्कूल परिसर में एक स्मृति पट्ट या लाहिड़ी स्कूल विरासत गैलरी भी बनाई जा सकती है, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस संस्था के योगदान को जान सकें।
मलबे के बीच बची है एक पूरी पीढ़ी की कहानी
आज लाहिड़ी स्कूल की पुरानी इमारत का बड़ा हिस्सा जमीन पर है।
लेकिन इस स्कूल की कहानी खत्म नहीं हुई।
क्योंकि किसी स्कूल की असली पहचान उसकी दीवारों से नहीं, बल्कि वहां से निकलने वाले विद्यार्थियों से होती है।
इमारत ढह सकती है…
दीवारें टूट सकती हैं…
छत मिट्टी में मिल सकती है…
लेकिन बचपन की यादें कभी मलबे में नहीं बदलतीं।
1948 से शिक्षा की पहचान बने लाहिड़ी स्कूल की पुरानी इमारत आज भले ही इतिहास बन गई हो, लेकिन चिरमिरी की हजारों यादों में यह विद्यालय हमेशा जिंदा रहेगा।
एक इमारत का अंत हुआ है, एक इतिहास का नहीं।











