CHIRIMIRI SPECIAL — भाग 01
चिरमिरी। विशेष रिपोर्ट। छत्तीसगढ़ हेडलाइन। आज का चिरमिरी सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि करीब एक सदी पुराने औद्योगिक इतिहास की पहचान है। इसकी गलियों, पुरानी कॉलोनियों, रेलवे लाइन और खदानों के पीछे एक ऐसी कहानी छिपी है, जिसकी शुरुआत 1928 के आसपास हुई थी। उस समय चिरमिरी आज की तरह विकसित शहर नहीं था। पहाड़, जंगल और कोयले से भरी धरती इस क्षेत्र की पहचान थे। लेकिन जमीन के नीचे मौजूद काले सोने ने आने वाले दशकों में इस पूरे इलाके की तस्वीर बदल दी।
⛏️ 1928: चिरमिरी के इतिहास का निर्णायक साल
चिरमिरी के इतिहास से जुड़े उपलब्ध सरकारी और शोध दस्तावेज बताते हैं कि 1928 में यहां कोयला खनन की शुरुआत हुई।
कोरिया जिला प्रशासन के आधिकारिक इतिहास में चिरमिरी कोलियरी और कुरासिया कोलियरी दोनों का संबंध 1928 से बताया गया है। वहीं चिरमिरी के शहरी विकास पर प्रकाशित शोध में W.M. Pitt द्वारा 1928 में खनन संचालन शुरू करने और कुरासिया कोलियरी को चिरमिरी टाउन की शुरुआती operational mine के रूप में दर्ज किया गया है।
यानी शुरुआती खनन को लेकर स्रोतों में विवरण का थोड़ा अंतर जरूर है, लेकिन एक बात स्पष्ट है—
1928 वह दौर था, जब चिरमिरी का कोयला अध्याय शुरू हुआ।
कोयला निकला तो रोजगार के दरवाजे खुले।
खनन शुरू होने का मतलब केवल धरती से कोयला निकालना नहीं था। खदानों को चलाने के लिए बड़ी संख्या में मजदूरों और कर्मचारियों की जरूरत थी। धीरे-धीरे यहां रोजगार के लिए लोग आने लगे। खदानों में काम करने वाले मजदूरों के साथ—
- तकनीकी कर्मचारी
- मशीन ऑपरेटर
- मैकेनिक
- परिवहन कर्मी
- रेलवे कर्मचारी
- ठेकेदार
- दुकानदार
- निर्माण मजदूर
जैसे लोगों के लिए भी काम के अवसर बनने लगे।
यही रोजगार आगे चलकर चिरमिरी की आबादी बढ़ने का सबसे बड़ा आधार बना। एक खदान के आसपास शुरू हुई गतिविधियां धीरे-धीरे बस्ती, बाजार और फिर शहर में बदलने लगीं।
कुरासिया और छोटा बाजार बने शुरुआती केंद्र
चिरमिरी के शुरुआती खनन इतिहास में कुरासिया और छोटा बाजार का नाम महत्वपूर्ण है। प्रकाशित शोध के अनुसार कुरासिया क्षेत्र चिरमिरी के शुरुआती खनन केंद्रों में प्रमुख था। छोटा बाजार भी प्रारंभिक खनन गतिविधियों से जुड़ा रहा।
इन क्षेत्रों के आसपास मजदूर बस्तियां और कोलियरी से जुड़ी सुविधाएं विकसित होने लगीं।
यहीं से चिरमिरी का वह स्वरूप बनना शुरू हुआ, जिसे बाद में लोग “कोयला नगरी” के नाम से पहचानने लगे।
🚂 लेकिन अभी चिरमिरी को लंबा सफर तय करना था…
कोयला निकलने लगा था, मजदूर आने लगे थे, लेकिन एक बड़ी समस्या थी, कोयला बाहर कैसे जाएगा ?
उस दौर में परिवहन आसान नहीं था। यहीं से चिरमिरी के इतिहास में रेलवे की एंट्री होती है।
1931 में अनूपपुर-बिजुरी होते हुए रेलवे लाइन चिरमिरी तक पहुंची।
रेलवे आने के बाद कोयले की ढुलाई बड़े पैमाने पर संभव हुई और चिरमिरी के विकास को नई रफ्तार मिली।
लेकिन रेलवे की यह कहानी हम अगली कड़ी में विस्तार से बताएंगे।
👥 1928 में चिरमिरी की आबादी कितनी थी ?
यह सवाल भी बेहद महत्वपूर्ण है।
लेकिन उपलब्ध दस्तावेजों की जांच में 1928 की चिरमिरी की सटीक आधिकारिक आबादी का आंकड़ा नहीं मिलता। चिरमिरी का पहला उपलब्ध आधिकारिक जनगणना आंकड़ा 1941 का है।
1941 में चिरमिरी की आबादी — 10,044
यानी खनन शुरू होने के लगभग 13 साल बाद यहां दस हजार से ज्यादा आबादी दर्ज हो चुकी थी।
यह आंकड़ा बताता है कि खनन और रोजगार ने इस क्षेत्र के सामाजिक और जनसंख्या स्वरूप को कितनी तेजी से बदला।
🕰️ 1928 से शुरू हुआ सफर आज 2026 तक पहुंच चुका है
करीब 98 साल के इस सफर में चिरमिरी ने बहुत कुछ देखा।
- ब्रिटिश शासन का दौर..
- आजादी..
- निजी खदानों का दौर..
- 1973 का राष्ट्रीयकरण..
- Coal India..
- SECL..
- नई तकनीक..
- पुरानी खदानों का बंद होना..
- और बदलता रोजगार।
लेकिन इन सबकी शुरुआत एक छोटे से खनन क्षेत्र से हुई थी— 1928 में।



📌 CHIRIMIRI SPECIAL का अगला भाग 02
“1931: जब चिरमिरी पहुंची रेलवे—कोयले के साथ कैसे बदल गई शहर की किस्मत?”
अगली कड़ी में जानिए—
रेलवे चिरमिरी तक क्यों लाई गई?
कोयले की ढुलाई कैसे होती थी?
रेलवे आने के बाद रोजगार और व्यापार में क्या बदलाव आया?
और सबसे महत्वपूर्ण—
रेलवे ने चिरमिरी को सिर्फ देश से जोड़ा या एक शहर के रूप में जन्म देने में भी बड़ी भूमिका निभाई?
पढ़ते रहिए — CHIRIMIRI SPECIAL, सिर्फ छत्तीसगढ़ हेडलाइन पर।










