तिल्दा नेवरा। दूध के दाम को लेकर शुरू हुआ विवाद अब सड़क से निकलकर शिवनाथ नदी तक पहुंच गया है। दूध की कीमत बढ़ाने की मांग को लेकर दूध विक्रेताओं ने शनिवार को ऐसा विरोध किया, जिसने पूरे तिल्दा नेवरा का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। सोमनाथ धाम स्थित शिवनाथ नदी के तट पर दूध विक्रेताओं ने हजारों लीटर दूध नदी में बहाकर डेयरी संचालकों के खिलाफ अपना आक्रोश जाहिर किया।
दूध विक्रेताओं की हड़ताल के चलते शनिवार को तिल्दा नेवरा में डेयरी, होटल, दुकान और घरों तक दूध की सप्लाई पूरी तरह ठप रही। सुबह से ही दूध की तलाश में लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ा। रोजमर्रा की जरूरत का दूध बाजार से गायब रहा और दूध के दाम को लेकर चल रहा विवाद अब आम लोगों के बीच भी चर्चा का बड़ा मुद्दा बन गया है।
42 रुपये का दूध 52 रुपये करने की मांग
दूध विक्रेताओं का कहना है कि वर्तमान में डेयरी संचालकों को गाय का दूध 42 रुपये प्रति लीटर और भैंस का दूध 52 रुपये प्रति लीटर की दर से दिया जा रहा है। उनकी मांग है कि गाय के दूध की कीमत बढ़ाकर 52 रुपये प्रति लीटर और भैंस के दूध की कीमत 60 रुपये प्रति लीटर की जाए। यादव समाज से जुड़े दूध विक्रेताओं का कहना है कि पशुओं के चारे, रखरखाव और पालन-पोषण का खर्च लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में मौजूदा कीमत पर दूध उपलब्ध कराना उनके लिए मुश्किल हो रहा है।
हमसे कम कीमत पर लेते हैं, जनता को महंगा बेचते हैं
दूध विक्रेताओं ने डेयरी संचालकों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उनसे कम कीमत पर दूध लिया जाता है और यही दूध आम उपभोक्ताओं को अधिक कीमत पर बेचा जाता है। विक्रेताओं का कहना है कि जब बाजार में दूध की कीमत अधिक है, तो उत्पादक और दूध उपलब्ध कराने वाले लोगों को भी उचित कीमत मिलनी चाहिए।
डेयरी संचालकों की भी अपनी दलील
दूसरी ओर डेयरी संचालकों का कहना है कि दूध के दाम में अचानक बड़ी बढ़ोतरी करने का सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ेगा। उनका कहना है कि खरीद मूल्य बढ़ने पर उन्हें भी उपभोक्ताओं के लिए दूध महंगा करना पड़ेगा, जिससे पहले से महंगाई की मार झेल रहे परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा।
दूध नदी में बहा, लेकिन समाधान नहीं निकला
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस दूध से हजारों परिवारों की रोजमर्रा की जरूरत पूरी होती है, वही दूध शनिवार को हजारों लीटर की मात्रा में नदी में बहा दिया गया। एक तरफ दूध के उचित दाम की मांग है, तो दूसरी तरफ कीमत बढ़ने से आम जनता पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ की चिंता। फिलहाल दोनों पक्षों के बीच गतिरोध कायम है। न दूध विक्रेताओं की मांग पूरी हुई है और न ही दूध की आपूर्ति बहाल हो पाई है। तिल्दा नेवरा में दूध के दाम को लेकर शुरू हुआ विवाद अब किस मोड़ पर पहुंचता है, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
दूध की कीमत पर यह लड़ाई आखिर कब खत्म होगी—और इसका बोझ आखिरकार किसकी जेब पर पड़ेगा?










